Shriman Narayaneeyam

दशक 91 | प्रारंभ | दशक 93

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दशक ९२

वेदैस्सर्वाणि कर्माण्यफलपरतया वर्णितानीति बुध्वा
तानि त्वय्यर्पितान्येव हि समनुचरन् यानि नैष्कर्म्यमीश ।
मा भूद्वेदैर्निषिद्धे कुहचिदपि मन:कर्मवाचां प्रवृत्ति-
र्दुर्वर्जं चेदवाप्तं तदपि खलु भवत्यर्पये चित्प्रकाशे ॥१॥

वेदै:-सर्वाणि कर्माणि- वेदों के समस्त कर्म काण्डों के
अफल-परतया परे, नैष्कर्म्य का ही प्रतिपादन
वर्णितानि-इति बुध्वा वर्णित हैं, ऐसा जान कर
तानि त्वयि-अर्पितानि-एव वे (कर्म काण्ड) आपको ही अर्पित हैं
हि समनुचरन् ऐसा ही व्यवहार करके
यानि नैष्कर्म्यम्-ईश पा जाऊं निष्कर्मता को हे ईश्वर!
मा भूत्- नहीं हो
वेदै:-निषिद्धे वेदों में वर्जित
कुहचित्-अपि कोई भी
मन:-कर्म-वाचाम् मन कर्म या वचन की
प्रवृत्ति:-दुर्वर्जम्- प्रवृत्ति, (यदि) संयोगवश
चेत्-अवाप्तम् यदि मिल जाएं
तत्-अपि खलु वे भी निस्सन्देह
भवति-अर्पये आपके लिए ही अर्पित (हों)
चित्प्रकाशे हे चित्प्रकाशात्मक!

हे ईश्वर! वेदों में निर्देशित समस्त कर्मकाण्ड अन्तत: नैष्कर्म्य का ही प्रतिपादन करते हैं, जान कर वे कर्मकाण्ड आपको ही समर्पित कर के मैं, निष्कर्मता प्राप्त करूं। वेदों में वर्जित किसी भी मन कर्म या वचन की कोई भी प्रवृत्ति नहीं हो। यदि संयोगवश, ऐसे कर्म मेरे द्वारा हो भी जाएं, तो वे भी, हे चित्प्रकाशात्मक! आपको ही समर्पित कर दूं।

यस्त्वन्य: कर्मयोगस्तव भजनमयस्तत्र चाभीष्टमूर्तिं
हृद्यां सत्त्वैकरूपां दृषदि हृदि मृदि क्वापि वा भावयित्वा ।
पुष्पैर्गन्धैर्निवेद्यैरपि च विरचितै: शक्तितो भक्तिपूतै-
र्नित्यं वर्यां सपर्यां विदधदयि विभो त्वत्प्रसादं भजेयम् ॥२॥

य:-तु-अन्य: कर्मयोग:- वह जो दूसरा कर्मयोग (है)
तव भजनमय:-तत्र च अपका भजनमय वहां और
अभीष्ट-मूर्तिं (मेरे) इष्ट की प्रतिमा को
हृद्यां सत्त्व-एक-रूपां हृदय में, एक मात्र सत्व स्वरूप को
दृषदि हृदि मृदि पत्थर में, मन में, (अथवा) मिट्टी में
क्वापि वा भावयित्वा कहीं भी अथवा कल्पना कर के
पुष्पै:-गन्धै:-निवेद्यै:- पुष्पों से, अगर धूपादि से, प्रसाद से
अपि च विरचितै: भी और बना कर
शक्तित: भक्तिपूतै:- यथाशक्ति पावन भक्ति से
नित्यं वर्यां सपर्यां प्रतिदिन उत्तम पूजा का
विदधत्-अयि विभो अनुष्ठान कर के अयि विभो!
त्वत्-प्रसादं भजेयम् आपका (कृपा) प्रसाद प्राप्त करूं

वेदों में प्रतिपादित आगम कर्मयोग में भजनमय भक्ति प्रधान है। उसे, आपके एकमात्र सत्व स्वरूप की कल्पना कर के, अपने हृदय में, पत्थर में, मन में, अथवा मिट्टि में, कहीं भी, यथाशक्ति, अगर धूप और नैवेद्य आदि से पावन भक्ति से परिपूर्ण उत्तम पूजा का अनुष्ठान करके, आपका कृपा प्रसाद प्राप्त करूं।

स्त्रीशूद्रास्त्वत्कथादिश्रवणविरहिता आसतां ते दयार्हा-
स्त्वत्पादासन्नयातान् द्विजकुलजनुषो हन्त शोचाम्यशान्तान् ।
वृत्त्यर्थं ते यजन्तो बहुकथितमपि त्वामनाकर्णयन्तो
दृप्ता विद्याभिजात्यै: किमु न विदधते तादृशं मा कृथा माम् ॥३॥

स्त्री-शूद्रा:- स्त्री शूद्र (आदि जन)
त्वत्-कथा-आदि- आपकी कथा आदि
श्रवण-विरहिता:- सुनने से वञ्चित
आसतां ते दयार्हा:- होते है दया के पात्र
त्वत्-पाद-आसन्न-यातान् आपके चरणों के निकट जाने वाले
द्विजकुल-जनुष: हन्त ब्राह्मण कुल के लोग भी, हाय,
शोचामि-अशान्तान् शोचनीय हैं अशान्त (वे लोग)
वृत्त्यर्थं ते यजन्त: धन के लिए वे यज्ञादि (कर्म) करते हैं
बहु-कथितम्-अपि अनेक बार (वेदादि में) कहे जाने पर भी
त्वाम्-अनाकर्णयन्त: आपको (आपकी शिक्षा को) न सुन कर
दृप्ता: विद्या-अभिजात्यै: दम्भ, विद्या और उच्च कुल का (होने से)
किमु न विदधते क्या नहीं करते (दुष्कर्म)
तादृशं उन जैसों के समान
मा कृथा माम् न करें मुझको

स्त्री शूद्र आदि तो आपकी कथा आदि से वञ्चित होने के कारण दया के पात्र हैं। आपके चरणों के निकट जाने वाले ब्राह्मण कुल के वे अशान्त लोग भी शोचनीय हैं, जो धनार्जन के लिए यज्ञादि कर्म करते हैं। वेदादि में अनेक बार कहे जाने पर भी, आपकी शिक्षा को भी अनसुनी करके, उच्च कुल और विद्या के दम्भ से वे लोग क्या क्या कुकर्म नहीं करते। हे प्रभु! उन लोगों के समान मुझे न बनाए।

पापोऽयं कृष्णरामेत्यभिलपति निजं गूहितुं दुश्चरित्रं
निर्लज्जस्यास्य वाचा बहुतरकथनीयानि मे विघ्नितानि ।
भ्राता मे वन्ध्यशीलो भजति किल सदा विष्णुमित्थं बुधांस्ते
निन्दन्त्युच्चैर्हसन्ति त्वयि निहितमतींस्तादृशं मा कृथा माम् ॥४॥

पाप:-अयं-कृष्ण-राम- पापी है यह, कृष्ण राम
इति-अभिलपति इस प्रकार कहता है
निजं गूहितुं दुश्चरित्रं स्वयं के छुपाने के लिए दुष्कर्मों को
निर्लज्जस्य-अस्य वाचा इस निर्ल्लज के वचनों के कारण
बहुतर-कथनीयानि मे अनेक वक्तव्यों में मेरे
विघ्नितानि विघ्न हो गया है
भ्राता मे वन्ध्यशील: भाई मेरा धोखेबाज है
भजति किल सदा विष्णुम्- भजता है निस्सन्देह सर्वदा विष्णु को
इत्थं बुधान्-ते इस प्रकार से बुद्धिमान आपके (भक्तों की)
निन्दन्ति-उच्चै:-हसन्ति निन्दा करते हैं और प्रहास करते हैं
त्वयि निहित-मतीन् आपमें दत्त चित्त वालों का
तादृशं मा कृथा माम् वैसा नहीं करें मुझको

'यह पापी है, स्वयं के दुष्कर्मों को छुपाने के लिए कृष्ण और राम कहता रहता है।' 'इस निर्लज्ज के वचनों से मेरे वक्तव्य में विघ्न पड जाता है।' 'मेरा भाई निस्सन्देह धोकेबाज है, इसलिए सर्वदा विष्णु का भजन करता रहता है।' आपमें दत्त चित्त आपके बुद्धिमान भक्तों की निन्दा और उपहास लोग ऐसे अनेक प्रकार से करते रहते हैं। उनके जैसा मुझे न बनाएं।

श्वेतच्छायं कृते त्वां मुनिवरवपुषं प्रीणयन्ते तपोभि-
स्त्रेतायां स्रुक्स्रुवाद्यङ्कितमरुणतनुं यज्ञरूपं यजन्ते ।
सेवन्ते तन्त्रमार्गैर्विलसदरिगदं द्वापरे श्यामलाङ्गं
नीलं सङ्कीर्तनाद्यैरिह कलिसमये मानुषास्त्वां भजन्ते ॥५॥

श्वेत-च्छायं कृते शुक्ल कान्ति युक्त कृतयुग में
त्वां मुनिवरवपुषं आप तपस्वी वेष में
प्रीणयन्ते तपोभि:- प्रसन्न किए जाते हैं तपस्या से
त्रेतायां त्रेता में
स्रुक्-स्रुव-आदि-अङ्कितम्- स्रुक, स्रुव आदि चिन्हों से अङ्कित
अरुण-तनुं अरुण कान्ति वेष में
यज्ञरूपं यजन्ते यज्ञपुरुष को यज्ञ से (आहूति देते हैं)
सेवन्ते तन्त्र-मार्गै:- उपासना करते हैं (आपकी) तन्त्र मार्गों से
विलसत्-अरि-गदं सुशोभित चक्र और गदा से
द्वापरे श्यामल-अङ्गम् द्वापर में श्यामल अङ्गों से
नीलं सङ्कीर्तन-आद्यै:- नील कान्ति युक्त, सङ्कीर्तन आदि से
इह कलि-समये यहां कलियुग में
मानुषा:-त्वां भजन्ते मनुष्य आपका भजन करते हैं

कृतयुग में, शुक्ल कान्ति युक्त तपस्वी वेश धारी आपको तपस्या से प्रसन्न किया जाता है। त्रेता युग में अरुण कान्ति युक्त स्रुक स्रुव आदि चिन्हों से अङ्कित आप यज्ञपुरुष के रूप में आप को यज्ञों की आहूति से प्रसन्न किया जाता है। द्वापर में चक्र और गदा से सुशोभित श्यामल अङ्गों की कान्ति वाले आपकी उपासना तन्त्र मार्गों से की जाती है। कलियुग में मनुष्य नील कान्ति युक्त आपको, नाम सङ्कीर्तन आदि से भजते हैं।

सोऽयं कालेयकालो जयति मुररिपो यत्र सङ्कीर्तनाद्यै-
र्निर्यत्नैरेव मार्गैरखिलद न चिरात्त्वत्प्रसादं भजन्ते ।
जातास्त्रेताकृतादावपि हि किल कलौ सम्भवं कामयन्ते
दैवात्तत्रैव जातान् विषयविषरसैर्मा विभो वञ्चयास्मान् ॥६॥

स:-अयं कालेय-काल: वही यह है कलि काल
जयति मुररिपो (इसकी) जय हो हे मुरारि
यत्र सङ्कीर्तन-आद्यै:- जहां सङ्कीर्तन आदि से
निर्यत्नै:-एव मार्गै:- बिना यत्न की ही विधियों से
अखिलद न चिरात्- हे सर्वस्व दानी! नहीं विलम्ब से (शीघ्र ही)
त्वत्-प्रसादं भजन्ते आपकी प्रसन्नता प्राप्त करते हैं
जाता:-त्रेता-कृत्-आदौ-अपि जन्म लिया है त्रेता कृत आदि में (वे) भी
हि किल कलौ निस्सन्देह कलि काल में
सम्भवं कामयन्ते जन्म लेना चाहते हैं
दैवात्-तत्र-एव जातान् सुयोग से वहीं (कलि में) जन्मे हुए
विषय-विष-रसै:- विषय के विषपूर्ण रसों से
मा विभो वञ्चय-अस्मान् नही, हे प्रभो! प्रवञ्चित करें हमको

हे मुरारि! यह वही कलि काल है, जहां सङ्कीर्तन आदि बिना यत्न वाली विधियों से ही, हे सर्वस्वदानी! निर्विलम्ब आपकी प्रसन्नता प्राप्त की जाती है। जिन लोगों ने कृत त्रेता आदि में जन्म लिया है, वे भी निस्सन्देह कलि काल में जन्म लेना चाहते हैं। सुयोग से हमने उसी कलि काल में हमने जन्म लिया है। हे प्रभो! कलिकाल के विषयों से युक्त विषपूर्ण रसों से हमें प्रवञ्चित न करें।

भक्तास्तावत्कलौ स्युर्द्रमिलभुवि ततो भूरिशस्तत्र चोच्चै:
कावेरीं ताम्रपर्णीमनु किल कृतमालां च पुण्यां प्रतीचीम् ।
हा मामप्येतदन्तर्भवमपि च विभो किञ्चिदञ्चद्रसं त्व-
य्याशापाशैर्निबध्य भ्रमय न भगवन् पूरय त्वन्निषेवाम् ॥७॥

भक्ता:-तावत्-कलौ भक्त जन अब तक कलियुग में
स्यु:-द्रमिल-भुवि हुए (हैं) द्रमिल भूमि में
तत:-भूरिश:- उनमें से अधिकांश
तत्र च-उच्चै: वहां भी अधिकतर
कावेरीं ताम्रपर्णीम्- कावेरी, ताम्रपर्णी
अनु किल कृतमालां और फिर कृतमाला
च पुण्यां प्रतीचीम् और पुण्या पश्चिमवाहिनी नर्मदा (के तटों पर)
हा माम्-अपि- हाय! मुझे भी
एतत्-अन्तर्भवम्-अपि इस क्षेत्र में जन्मे हुए को भी
च विभो और हे विभो!
किञ्चित्-अञ्चत्-रसं त्वयि- कुछ सिञ्चन है रस का आपमें
आशा-पाशै:-निबध्य आशाओं के पाशों मे जकड कर
भ्रमय न भगवन् भ्रमित न करें हे भगवन!
पूरय त्वत्-निषेवाम् परिपूर्ण करें आपकी सुसेवा

कलियुग में अधिकांश भक्त जन द्रमिल भूमि में हुए हैं। उनमें भी अधिकतर कावेरी, ताम्रपर्णी, कृतमाला और पश्चिमवाहिनी पुण्या नर्मदा के प्रदेशों में हुए हैं। हे विभो! हाय! इसी प्रदेश में जन्म लिए हुए मुझको, जो यत्किञ्चित आपकी भक्ति के रस से भी सिञ्चित है, आशाओं के पाशों में जकड कर भ्रमित न करें। हे भगवन! आपकी सुसेवा मय भक्ति को परिपुष्ट करें।

दृष्ट्वा धर्मद्रुहं तं कलिमपकरुणं प्राङ्महीक्षित् परीक्षित्
हन्तुं व्याकृष्टखड्गोऽपि न विनिहतवान् सारवेदी गुणांशात् ।
त्वत्सेवाद्याशु सिद्ध्येदसदिह न तथा त्वत्परे चैष भीरु-
र्यत्तु प्रागेव रोगादिभिरपहरते तत्र हा शिक्षयैनम् ॥८॥

दृष्ट्वा धर्मद्रुहं तं देख कर धर्म के द्रोही उस
कलिम्-अपकरुणं कलि को क्रूर
प्राक्-महीक्षित् परीक्षित- पहले राजा परीक्षित ने
हन्तुं व्याकृष्ट-खड्ग:-अपि वध के लिए खींच ली खड्ग भी
न विनिहितवान् नहीं वध किया
सारवेदी गुण-अंशात् सारवेदी गुणों के अंशों को, (कलि के)
त्वत्-सेवा-आदि- आपकी पूजा आदि से
आशु-सिद्ध्येत्- शीघ्र सिद्ध होती है
असत्-इह न तथा असत्य यहां नहीं उस प्रकार (सिद्ध होते)
त्वत्-परे च-एष भीरु:- आपके भक्तों से यह भय करता है
यत्-तु प्राक्-एव इसलिए पहले ही
रोग-आदिभि:-अपहरते रोग आदि से (भक्तों) का अपहरण कर लेता है
तत्र हा वहां (इसके लिए) हाय
शिक्षय-एनम् सजा दें इसको

राजा परीक्षित ने क्रूर, धर्म द्रोही कलि को देख, उसका वध करने के लिए, खड्ग खींच लिया था, किन्तु कलि युग के गुणों के अंशों के सार को जानने के कारण उसका वध नहीं किया। कलियुग में आपकी पूजा सेवा आदि शीघ्र ही सिद्ध होती है, जब कि दुष्कर्म उस प्रकार सिद्ध नहीं होते। कलियुग आपके भक्तों से भयभीत भी रहता है, इसीलिए भक्ति पुष्ट होने से पहले ही रोग आदि से उनका अपहरण कर लेता है। हाय! इस लिए कलि को दण्ड दीजिए।

गङ्गा गीता च गायत्र्यपि च तुलसिका गोपिकाचन्दनं तत्
सालग्रामाभिपूजा परपुरुष तथैकादशी नामवर्णा: ।
एतान्यष्टाप्ययत्नान्ययि कलिसमये त्वत्प्रसादप्रवृद्ध्या
क्षिप्रं मुक्तिप्रदानीत्यभिदधु: ऋषयस्तेषु मां सज्जयेथा: ॥९॥

गङ्गा गीता च गङ्गा और गीता
गायत्री-अपि च और गायत्री भी
तुलसिका तुलसी
गोपिका चन्दनं तत् वह गोपिका चन्दन
सालग्राम-अभिपूजा सालग्राम की पूजा
परपुरुष हे परमपुरुष!
तथा-एकादशी तथा एकादशी का व्रत
नामवर्णा: और नामों का संकीर्तन
एतानि-अष्ट-अपि यह आठ भी
अयत्नानि-अयि बिना प्रयास के, अयि!
कलि-समये कलियुग के समय में
त्वत्-प्रसाद-प्रवृद्ध्या आपके कृपा बाहुल्य से
क्षिप्रं-मुक्ति-प्रदानी-इति- शीघ्र ही मुक्ति प्रदायी हैं, इस प्रकार
अभिदधु:-ऋषय:- कहा है ऋषियों ने
तेषु मां सज्जयेथा: उन (आठ) में मुझको नियोजित कीजिए

हे परमपुरुष! गङ्गा, गीता और गायत्री, तुलसी और गोपिका चन्दन, सालग्राम की पूजा, एकादशी का व्रत तथा नामों का सङ्कीर्तन, ये आठ बिना प्रयास के कलियुग में, आपकी प्रभूत कृपा से, शीघ्र ही मुक्ति प्रदायी है। ऐसा ऋषियों ने कहा है। हे प्रभु! उन आठों में मुझको संलग्न कीजिए।

देवर्षीणां पितृणामपि न पुन: ऋणी किङ्करो वा स भूमन् ।
योऽसौ सर्वात्मना त्वां शरणमुपगतस्सर्वकृत्यानि हित्वा ।
तस्योत्पन्नं विकर्माप्यखिलमपनुदस्येव चित्तस्थितस्त्वं
तन्मे पापोत्थतापान् पवनपुरपते रुन्धि भक्तिं प्रणीया: ॥१०॥

देवर्षीणां देवगणों के
पितृणाम्-अपि पितृगण के भी
न पुन: ऋणी नहीं फिर ऋणी
किङ्कर: वा स किंकर अथवा वह (होता है)
भूमन् हे भूमन!
य:-असौ सर्वात्मना जो भी सम्पूर्ण भाव से
त्वां शरणम्-उपगत:- आपकी शरण आ जाता है
सर्व-कृत्यानि हित्वा सभी कर्मों का त्याग करके
तस्य-उत्पन्नं विकर्म-अपि- उसके किए हुए वर्जित कर्म भी
अखिलम्-अपनुदसि-एव समस्त नष्ट हो जाते हैं
चित्त-स्थित:-त्वं (क्योंकि उसके) चित्त में आप स्थित हैं
तत्-मे पाप-उत्थ-तापान् इसलिए मेरे पापों से उत्पन्न क्लेशों का
पवनपुरपते हे पवनपुरपते!
रुन्धि भक्तिं प्रणीया: नाश करके भक्ति को दृढ कीजिए

हे भूमन! जो जन सम्पूर्ण भाव से आपकी शरण में आ जाता है, वह फिर देवगणों का अथवा पितृगणों का ऋणी नहीं रह जाता, न हीं वह किसी प्रकार से किंकर होता है। वह अपने समस्त कर्मों का त्याग कर देता है और उसके द्वारा किए हुए वर्जित कर्म भी नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि उसके चित्त में आप स्थित होते हैं। हे पवनपुरपते! मेरे पापों से उत्पन्न क्लेशों का नाश करके मेरी भक्ति को दृढ कीजिए।

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