Shriman Narayaneeyam

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दशक ७५

प्रात: सन्त्रस्तभोजक्षितिपतिवचसा प्रस्तुते मल्लतूर्ये
सङ्घे राज्ञां च मञ्चानभिययुषि गते नन्दगोपेऽपि हर्म्यम् ।
कंसे सौधाधिरूढे त्वमपि सहबल: सानुगश्चारुवेषो
रङ्गद्वारं गतोऽभू: कुपितकुवलयापीडनागावलीढम् ॥१॥

प्रात: दूसरे दिन प्रात:काल
सन्त्रस्त-भोज- भयभीत भोजराज (कंस)
क्षितिपति-वचसा की आज्ञा से
प्रस्तुते मल्ल-तूर्ये आरम्भ होने के लिए मल्ल युद्ध के, तूर्य घोष होने पर
सङ्घे राज्ञां च और समूह राजाओं के
मञ्चान्-अभिययुषि मञ्चों पर आरूढ हो गए
गते नन्दगोपे- चले जाने पर नन्द गोप के
अपि हर्म्यम् भी महल को
कंसे-सौध-अधिरूढे कंस के सिंहासन पर आसीन हो जाने पर
त्वम्-अपि सह-बल: आप भी बलराम के साथ
सानुग:-चारु-वेष: सहचरों के साथ, आकर्षक वेश भूषा में
रङ्ग-द्वारं गत:-अभू: रंग शाला के द्वार पर पहुंचे
कुपित-कुवलयापीड- कुपित कुवलयापीड (नामक)
नाग-अवलीढम् हाथी ने अवरुद्ध किया था (द्वार को)

दूसरे दिन प्रात:काल, भयभीत भोजराज कंस की आज्ञा से तूर्य नाद के द्वारा मल्ल युद्ध के आरम्भ होने की घोषणा हो गई। राजाओं के समूह अपने निर्धारित मञ्चों पर आरूढ हो गए, और नन्दगोप भी महल में चले गए। कंस भी सिंहासन पर आसीन हो गया। तब आप आकर्षक वेश भूषा में, बलराम और अपने सहचरों के साथ रंगशाला के द्वार पर पहुंचे। उस द्वार को कुपित कुवलयापीड नामक हाथी ने अवरुद्ध कर रक्खा था।

पापिष्ठापेहि मार्गाद्द्रुतमिति वचसा निष्ठुरक्रुद्धबुद्धे-
रम्बष्ठस्य प्रणोदादधिकजवजुषा हस्तिना गृह्यमाण: ।
केलीमुक्तोऽथ गोपीकुचकलशचिरस्पर्धिनं कुम्भमस्य
व्याहत्यालीयथास्त्वं चरणभुवि पुनर्निर्गतो वल्गुहासी ॥२॥

पापिष्ठ-अपेहि अरे पापी हटो
मार्गात्-द्रुतम्- मार्ग से शीघ्र
इति वचसा यह कह कर
निष्ठुर-क्रुद्ध-बुद्धे- क्रूर और कुपित बुद्धि वाले
अम्बष्ठस्य प्रणोदात्- महावत के द्वारा प्रेरित
अधिक-जव-जुषा अतिशय गति मान
हस्तिना गृह्यमाण: हाथी ने (आपको) पकड लिया
केली-मुक्त:-अथ खेल खेल में ही छूट कर तब
गोपी-कुच-कलश- गोपियों के कुच कलशों से
चिर-स्पर्धिनं सदा स्पर्धाशाली
कुम्भम्-अस्य व्याहत्य- कुम्भ के समान मस्तक पर इसके प्रहार किया
अलीयथा:-त्वं छुप गए आप
चरण-भुवि (उसके) पैरों के बीच में
पुन:-निर्गत: फिर से निकल आए
वल्गु-हासी मधुर हास के साथ

अरे पापी! शीघ्र ही मार्ग से हटो'। आपके यह कहने पर क्रूर और कुपित बुद्धि वाले महावत के प्रेरित करने से हाथी ने तीव्र गति से आपको पकड लिया। आप खेल ही खेल में उसकी पकड से मुक्त हो गए। फिर, गोपियों के कुच कलशों से सदा ही स्पर्धाशील, उस हाथी के कुम्भ समान मस्तक पर आपने प्रहार किया और उसके पैरों के बीच छुप गए। उसके बाद मधुर हास के साथ आप बाहर निकल आए।

हस्तप्राप्योऽप्यगम्यो झटिति मुनिजनस्येव धावन् गजेन्द्रं
क्रीडन्नापात्य भूमौ पुनरपिपततस्तस्य दन्तं सजीवम् ।
मूलादुन्मूल्य तन्मूलगमहितमहामौक्तिकान्यात्ममित्रे
प्रादास्त्वं हारमेभिर्ललितविरचितं राधिकायै दिशेति ॥३॥

हस्त-प्राप्य:-अपि- हाथों में प्राप्त (आ कर) भी
अगम्य: झटिति अप्राप्य झट से
मुनिजनस्य- मुनिजनों के लिए
इव धावन् उसी प्रकार भागते हुए
गजेन्द्रं क्रीडन्- हाथी से खेलते हुए से मानो
आपात्य भूमौ पटक कर भूमि पर
पुन:-अभिपतत:-तस्य फिर जब वह झपटा तब उसके
दन्तं सजीवम् दांतो को जीवित अवस्था में ही
मूलात्-उन्मूल्य मूल से उखाड कर
तत्-मूलग- उसके मूल से निकले हुए
महित-महा- अमूल्य बडे
मौक्तिकानि- मोती
आत्म-मित्रे अपने मित्र को
प्रादा:-त्वम् दे दिये आपने
हारम्-एभि:- हार इनसे
ललित-विरचितं सुन्दर बनवा कर
राधिकायै राधा को
दिश-इति दे देना इस प्रकार (कहा)

साधना करने वाले मुनिजन के लिए जिस प्रकार आप प्राय: पकड में आने पर भी अप्राप्य हैं, उसी प्रकार भागते हुए उस हाथी की पकड में भी आप नहीं आ रहे थे। फिर सहसा उसके साथ मानो खेल खेलते हुए आपने उसे भूमि पर पटक दिया। इस पर जब वह आप पर झपटा, तब आपने जीवित अवस्था में ही उसके दांत जड से उखाड दिए। उन दांतों के मूल से बडे बडे अमूल्य मोती निकले । उन्हें आपने अपने मित्र को दे कर कहा कि 'इनसे एक सुन्दर हार बनवा कर राधा को दे देना,'।

गृह्णानं दन्तमंसे युतमथ हलिना रङ्गमङ्गाविशन्तं
त्वां मङ्गल्याङ्गभङ्गीरभसहृतमनोलोचना वीक्ष्य लोका: ।
हंहो धन्यो हि नन्दो नहि नहि पशुपालाङ्गना नो यशोदा
नो नो धन्येक्षणा: स्मस्त्रिजगति वयमेवेति सर्वे शशंसु: ॥४॥

गृह्णानं दन्तम्-अंसे उठाते हुए दांत को कन्धे पर
युतम्-अथ हलिना साथ में तब बलराम के
रङ्गम्-अङ्ग- रङ्गशाला में हे प्रभो!
आविशन्तम् प्रवेश करते हुए
त्वां मङ्गल्य-अङ्ग-भङ्गी- आपकी माङ्गलिक अङ्गभङ्गी को
रभस-हृत-मन:-लोचना (जो) हठात हरने वाली थी मन और नेत्रों को
वीक्ष्य लोका: देख कर लोग (कहने लगे)
हंहो धन्य हि नन्द: अहा! धन्य ही हैं नन्द
नहि नहि पशुपाल-अङ्गना नहीं नहीं गोपिकाएं (धन्य हैं)
नो यशोदा नहीं यशोदा ही धन्य है
नो नो धन्य-ईक्षणा: स्म:- अरे नहीं नहीं देखते हुए
त्रिजगति तीनों लोकों में
वयम्-एव-इति हम सब ही (धन्य हैं) इस प्रकार
सर्वे शशंसु: सभी कहने लगे

तब कन्धे पर हस्ति दन्त को उठा कर आपने बलराम के सङ्ग रङ्गशाला में प्रवेश किया। आपकी माङ्गलिक अङ्गभङ्गी हठात मन और नेत्रों को आकृष्ट करने वाली थी। देख कर सभी कहने लगे, 'नन्द भाग्यशाली हैं। नही नहीं, गोपिकाएं धन्य है। अरे नहीं, यशोदा ही अत्यधिक धन्य हैं। अरे नहीं इनके दर्शन करने से तीनों लोकों में सर्वाधिक धन्य हम ही हो गए हैं।'

पूर्णं ब्रह्मैव साक्षान्निरवधि परमानन्दसान्द्रप्रकाशं
गोपेषु त्वं व्यलासीर्न खलु बहुजनैस्तावदावेदितोऽभू: ।
दृष्ट्वऽथ त्वां तदेदंप्रथममुपगते पुण्यकाले जनौघा:
पूर्णानन्दा विपापा: सरसमभिजगुस्त्वत्कृतानि स्मृतानि ॥५॥

पूर्णं ब्रह्म-एव परिपूर्ण ब्रह्म ही
साक्षात्-निरवधि साक्षात निस्सीम
परम-आनन्द-सान्द्र-प्रकाशं परम आनन्द के घनीभूत प्रकाश स्वरूप
गोपेषु त्वं व्यलासी:- गोपों के मध्य में (अवतरित हो कर) लीला कर रहे हैं
न खलु बहु-जनै:- (यह) नही ही सामान्यतया लोगों को
तावत्-आविदेत:-अभू: तब तक ज्ञात हुआ था
दृष्ट्वा-अथ त्वां देख कर अब आपको
तत्-इदम्-प्रथमम्- वह यह पहला
उपगते पुण्यकाले प्रकट होने से पुण्य के समय का
जन-औघा: जन समूह
पूर्णानन्दा विपापा: पूर्णानन्दित और पाप रहित (हो कर)
सरसम्-अभिजगु:- रस ले ले कर वर्णन करने लगे
त्वत्-कृतानि स्मृतानि आपकी लीलाओं का याद कर कर के

साक्षात, निस्सीम, परम आनन्द के घनीभूत प्रकाश स्वरूप, परिपूर्ण ब्रह्म, स्वयं आप ही गोपों के मध्य अवतरित हो कर लीला कर रहे हैं, यह बात सामान्यतया लोगों को तब तक ज्ञात नहीं थी। आपको देख कर, मानो उनके पुण्योदय का प्रथम काल प्रस्तुत हुआ था, जिसके कारण वे पूर्णानन्दित और पाप रहित हो कर आपकी लीलाओं का स्मरण कर के, रस ले ले कर उनका वर्णन करने लगे।

चाणूरो मल्लवीरस्तदनु नृपगिरा मुष्टिको मुष्टिशाली
त्वां रामं चाभिपेदे झटझटिति मिथो मुष्टिपातातिरूक्षम् ।
उत्पातापातनाकर्षणविविधरणान्यासतां तत्र चित्रं
मृत्यो: प्रागेव मल्लप्रभुरगमदयं भूरिशो बन्धमोक्षान् ॥६॥

चाणूर: मल्लवीर:- चाणूर मल्ल (युद्ध) वीर
तदनु नृप-गिरा उसके बाद राजा के कहने से
मुष्टिक: मुष्टिशाली मुष्टिक, मुष्टि (युद्ध वीर)
त्वां रामं च-अभिपेदे आप और बलराम पर झपटे
झटझटिति मिथ: त्वरित गति से परस्पर
मुष्टि-पात-अति-रूक्षम् मुष्टि के प्रहार से अति कठोर
उत्पात-आपातन-आकर्षण- उछालने, पटकने, खींचने (आदि)
विविध-रणानि- विभिन्न दांव पेंच से
आसतां तत्र चित्रं थे जो वहां आश्चर्य है
मृत्यो: प्राक्-एव मृत्यु के पहले ही
मल्लप्रभु:-अगमत्-अयं (उस) मल्ल दक्ष ने प्राप्त किया इसने
भूरिश: बन्ध-मोक्षान् कई बार बन्धन और मोक्ष

उसके बाद राजा के कहने पर मल्लयुद्ध प्रवीण चाणूर और मुष्टि युद्ध वीर मुष्टिक ने आप पर और बलराम पर आक्रमण किया। फिर तो तीव्र गति से, परस्पर उछालना, पटकना खींचना आदि बिभिन्न दांव पेंच से वहां युद्ध होने लगा। आश्चर्य है कि मृत्यु के पहले ही मल्ल-दक्ष चणूर ने आपके हाथों अनेक बार बन्धन और मोक्ष प्राप्त किया।

हा धिक् कष्टं कुमारौ सुललितवपुषौ मल्लवीरौ कठोरौ
न द्रक्ष्यामो व्रजामस्त्वरितमिति जने भाषमाणे तदानीम् ।
चाणूरं तं करोद्भ्रामणविगलदसुं पोथयामासिथोर्व्यां
पिष्टोऽभून्मुष्टिकोऽपि द्रुतमथ हलिना नष्टशिष्टैर्दधावे ॥७॥

हा धिक् कष्टं हा हा! खेद है!
कुमारौ सुललित-वपुषौ दोनों कुमार कोमल शरीर वाले
मल्लवीरौ कठोरौ मल्लवीर कठोर
न द्रक्ष्याम: नहीं देखेंगे
व्रजाम:-त्वरितम्- चले जाएंगे शीघ्र ही
इति जने भाषमाणे इस प्रकार लोगों के कहने पर
तदानीम् चाणूरं तं उस समय चाणूर को उसको
कर-उद्भ्रामण- हाथ से घुमाते हुए
विगलत्-असुं निकल गए थे प्राण (जिसके)
पोथयामासिथ-उर्व्यां पटक दिया धरती पर
पिष्ट:-अभूत्-मुष्टिक:-अपि रौन्द दिया गया मुष्टिक भी
द्रुतम्-अथ हलिना शीघ्र ही बलराम के द्वारा
नष्ट-शिष्टै:-दधावे नष्ट होने से बचे हुए भाग गए

हा हा! खेद है! दोनों कुमार कोमल शरीर वाले हैं और ये मल्ल वीर क्रूर हैं। हम शीघ्र ही चले जाएंगे, यह युद्ध नहीं देखेंगे।' जब लोग इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय, आपने चाणूर को हाथ से घुमाते हुए धरती पर पटक दिया और उसके प्राण निकल गए। बलराम ने भी शीघ्र ही मुष्टिक को रौंद डाला। जो मल्ल योद्धा नष्ट होने से बचे गये, वे पलायन कर गए।

कंस संवार्य तूर्यं खलमतिरविदन् कार्यमार्यान् पितृंस्ता-
नाहन्तुं व्याप्तमूर्तेस्तव च समशिषद्दूरमुत्सारणाय ।
रुष्टो दुष्टोक्तिभिस्त्वं गरुड इव गिरिं मञ्चमञ्चन्नुदञ्चत्-
खड्गव्यावल्गदुस्संग्रहमपि च हठात् प्राग्रहीरौग्रसेनिम् ॥८॥

कंस संवार्य तूर्यं कंस ने रोक दिए ढोल
खल-मति:-अविदन् दुष्ट बुद्धि न जानते हुए
कार्यम्- कर्तव्य को
आर्यान्-पितॄन्-तान्-आहन्तुं आदरणीय पितृगणों को उनको मारने के लिए
व्याप्तमूर्ते:-तव हे सर्वव्यापी! आपके
च समशिषत्- और आदेश दिया
दूरम्-उत्सारणाय दूर हटा देने के लिए
रुष्ट: दुष्ट-उक्तिभि: -त्वं क्रुद्ध हो कर (उसकी) दुष्ट वाणी से आपने
गरुड:-इव गिरिं गरुड जैसे पर्वत पर (जा पहुंचता है)
मञ्चम्-अञ्चन्- मञ्च पर छलांग लगा कर
उदञ्चत्-खड्ग-व्यावल्ग- उठा कर तलवार चलाते हुए
दुस्संग्रहम्-अपि पकडे जाने में असम्भव भी (कंस को)
च हठात् प्राग्रही:- और सहसा झपट कर
औग्रसेनिम् अग्रसेन पुत्र (कंस) को

कंस ने ढोल बजाना रुकवा दिया। हे सर्वव्यापी! उस दुर्बुद्धि ने किंकर्तव्यविमूढ हो कर आपके आदरणीय पितृवर्ग को मारने और आपको दूर हटा देने का आदेश दिया। उस दुष्ट के क्रूर वचनों से आप क्रुद्ध हो गए। फिर, जैसे गरुड छलाग लगा कर पर्वत पर पहुंच जाता है, आप कंस के मञ्च पर पहुंच गए। अग्रसेन पुत्र कंस तलवार चला रहा था इसलिए उसे पकडना असम्भव था, फिर भी आपने सहसा झपट कर उसे पकड लिया।

सद्यो निष्पिष्टसन्धिं भुवि नरपतिमापात्य तस्योपरिष्टा-
त्त्वय्यापात्ये तदैव त्वदुपरि पतिता नाकिनां पुष्पवृष्टि: ।
किं किं ब्रूमस्तदानीं सततमपि भिया त्वद्गतात्मा स भेजे
सायुज्यं त्वद्वधोत्था परम परमियं वासना कालनेमे: ॥९॥

सद्य: निष्पिष्ट-सन्धिं तुरन्त ही चूर चूर करके सन्धियों को
भुवि नरपतिम्-आपात्य धरती पर राजा को पटक कर
तस्य-उपरिष्टात्- उसके ऊपर
त्वयि-आपात्ये तदा-एव आपके (कूदने पर) तब ही
त्वत्-उपरि पतिता आपके ऊपर गिरने लगे
नाकिनां पुष्प वृष्टि: देवों की पुष्प वृष्टि
किं किं ब्रूम:-तदानीं क्या क्या कहूं उस समय
सततम्-अपि भिया सदैव भय से
त्वत्-गत-आत्मा स भेजे आपमें लगी हुई आत्मा से उसने पाया
सायुज्यं त्वत्-वध-उत्था सायुज्य आपके मारने के फलस्वरूप
परम परम-इयं हे परमेश्वर! केवल यह
वासना कालनेमे: वासना थी कालनेमी की

तुरन्त ही आपने कंस उस राजा की सन्धियों को चूर चूर कर के उसे धरती पर पटक दिया, और उसके ऊपर कूद पडे। उसी समय देव गण आपके ऊपर पुष्प वर्षा करने लगे। हे परमेशवर! क्या क्या कहूं? सदैव आपके भय के कारण आपही में अत्मा लगाए हुए उस कंस ने आपके द्वारा मारे जाने के फलस्वरूप सायुज्य प्राप्त किया। क्योंकि कालनेमी के रूप में, अपने पूर्वजन्म में उसकी यही कामना थी।

तद्भ्रातृनष्ट पिष्ट्वा द्रुतमथ पितरौ सन्नमन्नुग्रसेनं
कृत्वा राजानमुच्चैर्यदुकुलमखिलं मोदयन् कामदानै: ।
भक्तानामुत्तमं चोद्धवममरगुरोराप्तनीतिं सखायं
लब्ध्वा तुष्टो नगर्यां पवनपुरपते रुन्धि मे सर्वरोगान् ॥१०॥

तत्-भ्रातृन्-अष्ट पिष्ट्वा उसके भाइयों आठों को पीस कर
द्रुतम्-अथ शीघ्र ही तब
पितरौ सन्नमन्- माता पिता को नमन करके
उग्रसेनं कृत्वा राजानम्- उग्रसेन को राजा बना कर
उच्चै:-यदुकुलम्-अखिलं बहुत ही यदुकुल को सम्पूर्ण
मोदयन् कामदानै: आनन्दित करके मनोरथ पूर्ण करके
भक्तानाम्-उत्तमं भक्तों में सर्वश्रेष्ठ
च-उद्धवम्- और उद्धव को
अमरगुरो:-आप्त-नीतिं देवगुरू से पाई थी नीति जिसने
सखायं लब्ध्वा मित्र रूप में पा कर
तुष्ट: नगर्यां सन्तुष्ट हो कर (मथुरा) नगरी में (निवास किया)
पवनपुरपते हे पवनपुरपते!
रुन्धि मे सर्व-रोगान् नष्ट कर देजिए मेरे सर्व रोगों को

कंस के आठों भाइयों को भी आपने पीस डाला, और शीघ्र ही अपने माता पिता को नमन करके नाना उग्रसेन को राजा बना दिया। यदुकुल के सम्पूर्ण मनोरथों को पूर्ण करके आपने उन्हें बहुत ही आनन्दित किया। देवगुरू बृहस्पति से नीतिशास्त्र की विद्या प्राप्त उद्धव को अपना मित्र बनाया। तदनन्तर सन्तुष्ट हो कर आप मथुरा पुरी में निवास करने लगे। हे पवनपुरेश! मेरे सभी रोगों को नष्ट कर दीजिए।

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