Shriman Narayaneeyam

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दशक ७२

कंसोऽथ नारदगिरा व्रजवासिनं त्वा-
माकर्ण्य दीर्णहृदय: स हि गान्दिनेयम् ।
आहूय कार्मुकमखच्छलतो भवन्त-
मानेतुमेनमहिनोदहिनाथशायिन् ॥१॥

कंस:-अथ कंस ने तब
नारद-गिरा नारद के कहने के अनुसार
व्रजवासिनं त्वां व्रज में रहने वाले आपको
आकर्ण्य यह सुन कर कि
दीर्ण-हृदय: भयभीत हृदय वाला
स हि उसने ही
गान्दिनेयम् गान्दिनी के पुत्र (अक्रूर) को
आहूय बुला कर
कार्मुक-मख:-छलत: धनुष यज्ञ के बहाने से
भवन्तम्-आनेतुम्- आपको लाने के लिए
एनम्-अहिनोत्- इसको भेजा
अहिनाथशायिन् हे शेषशायी!

हे शेषाशायिन प्रभो! जब नारद के कहने पर कंस को ज्ञात हुआ कि आप, व्रज में निवास कर रहे हैं, उसका हृदय भयभीत हो उठा। तब उसने गान्दिनी पुत्र अक्रूर को धनुष यज्ञ के बहाने से आपको लाने के लिये बुला भेजा।

अक्रूर एष भवदंघ्रिपरश्चिराय
त्वद्दर्शनाक्षममना: क्षितिपालभीत्या ।
तस्याज्ञयैव पुनरीक्षितुमुद्यतस्त्वा-
मानन्दभारमतिभूरितरं बभार ॥२॥

अक्रूर एष अक्रूर यह
भवत्-अंघ्रि-पर:- आपके चरणो का भक्त
चिराय बहुत समय से
त्वत्-दर्शन-अक्षम-मना: आपके दर्शन पाना असम्भव, जान कर
क्षितिपाल-भीत्या राजा के डर से
तस्य-आज्ञया-एव उसी की आज्ञा ही से
पुन:- फिर
ईक्षितुम्-उद्यत:-त्वाम्- देखने ने लिए तत्पर आपको
आनन्द-भारम्-अति- आनन्द अत्यधिक से
भूरितरं भरपूर
बभार हो गया

अक्रूर दीर्घ काल से आपके चरणों का भक्त था, किन्तु राजा (कंस) के डर से मान बैठा था कि आपके दर्शन उसके लिए असम्भव हैं। अब राजा की ही आज्ञा सुन कर वह पुन: आपको देखने के लिए व्याकुल हो उठा और आनन्दातिरेक से भरपूर हो गया।

सोऽयं रथेन सुकृती भवतो निवासं
गच्छन् मनोरथगणांस्त्वयि धार्यमाणान् ।
आस्वादयन् मुहुरपायभयेन दैवं
सम्प्रार्थयन् पथि न किञ्चिदपि व्यजानात् ॥३॥

स-अयं वह यह
रथेन रथ के द्वारा
सुकृती पुण्य शाली
भवत: निवासं आपके निवास को
गच्छन् जाते हुए
मनोरथ-गणान्- मनोरथों को अगिणित
त्वयि धार्यमाणान् आप ही में आधारित
आस्वादयन् मुहु:- अनुभव करते हुए बारम्बार
अपाय-भयेन दैवं विघ्नों के भय से देवों को
सम्प्रार्थयन् पथि प्रार्थना करते हुए
न किञ्चित्-अपि नही कुछ भी
व्यजानत् जाना

अक्रूर, रथ आपके प्रसिद्ध निवासस्थान नन्द गांव ले कर जाने के लिए प्रस्तुत हुए। अपने मन में, आपसे ही सम्बन्धित अनेको मनोरथों का वे बारम्बार अनुभव कर रहे थे। विघ्नों के भय से त्रस्त वे देवों की प्रार्थना करते जाते थे, और इसीलिए उन्हें मार्ग का कुछ ज्ञान नहीं हुआ।

द्रक्ष्यामि वेदशतगीतगतिं पुमांसं
स्प्रक्ष्यामि किंस्विदपि नाम परिष्वजेयम् ।
किं वक्ष्यते स खलु मां क्वनु वीक्षित: स्या-
दित्थं निनाय स भवन्मयमेव मार्गम् ॥४॥

द्रक्ष्यामि (मैं) देखूंगा
वेद-शत-गीत-गतिं वेदों के सैंकडों गीतों के नायक को
पुमांसं परम पुरुष को
स्प्रक्ष्यामि स्पर्श करूंगा
किंस्वित्-अपि थोडा सा भी
नाम परिष्वजेयम् क्या आलिङ्गन करूंगा
किं वक्ष्यते क्या कहेंगे
स खलु मां वे निश्चय ही मुझको
क्वनु वीक्षित: स्यात् कहां पर दिखाई देंगे
इत्थं निनाय इस प्रकार (विचार) ले कर
स भवन्मयम्-एव वह अपमें ही तन्मय हो कर
मार्गम् मार्ग में (चलते रहे)

अन्तत: मैं वेदों के सैंकडों गीतों के नायक को देखूंगा। उन परम पुरुष का स्पर्श करूंगा। क्या मैं थोडा सा भी उनको हृदय से लगा पाऊंगा? क्या कहेंगे वे मुझको ? कहां पर दिखाई देंगे? इस प्रकार आपमें ही तन्मय हो कर आपके ही विचारों में तल्लीन वे मार्ग में चलते जा रहे थे।

भूय: क्रमादभिविशन् भवदंघ्रिपूतं
वृन्दावनं हरविरिञ्चसुराभिवन्द्यम् ।
आनन्दमग्न इव लग्न इव प्रमोहे
किं किं दशान्तरमवाप न पङ्कजाक्ष ॥५॥

भूय: क्रमात्- फिर क्रमश:
अभिविशन् प्रवेश करते हुए
भवत्-अंघ्रि-पूतम् आपके चरणों से पवित्र
वृन्दावनम् वृन्दावन को
हर्-विरिञ्च-सुर- शंकर ब्रह्मा और देवों द्वारा
अभिवन्द्यम् वन्दनीय
आनन्द-मग्न इव आनन्द में डूबे हुए मानो
लग्न इव प्रमोहे डूबे हुए से मूर्छा में
किं किं क्या क्या
दशान्तरम्- दशाओं को
अवाप न प्राप्त नहीं हुए
पङ्कजाक्ष हे कमलनयन!

क्रमश: अक्रूर ने आपके चरण कमलों से पुनीत, शंकर ब्रह्मा और देवताओं द्वारा पूजित, वृन्दावन में फिर प्रवेश किया। हे कमलनयन! उस समय वे आनन्द मग्न हो कर मानों मूर्छा में डूबे हुए से, न जाने किन किन अवस्थाओं को प्राप्त हुए।

पश्यन्नवन्दत भवद्विहृतिस्थलानि
पांसुष्ववेष्टत भवच्चरणाङ्कितेषु ।
किं ब्रूमहे बहुजना हि तदापि जाता
एवं तु भक्तितरला विरला: परात्मन् ॥६॥

पश्यन्-अवन्दत देख कर वन्दना की
भवत्-विहृति-स्थलानि आपके विहार स्थलों की
पांसुषु-अवेष्टत धूलि में लोट गए (जहां)
भवत्-चरण-अङ्कितेषु आपके चरण चिह्न थे
किं ब्रूमहे क्या कहूं
बहुजना हि अनेक लोगों ने ही
तदापि जाता उस समय भी जन्म लिया था
एवं तु इस प्रकार किन्तु
भक्तितरला: भक्ति में सराबोर
विरला: बिरले (ही थे)
परात्मन् हे परमात्मन्!

अक्रूर ने आपके विहार स्थलों को देख कर उनकी वन्दना की। जिस भूमि पर आपके चरण कमलों के चिह्न अंकित थे, उसकी धूलि में लोट गए। और क्या कहूं? उस समय भी अनेक भक्तों ने जन्म लिया था किन्तु इस कोटि की भक्ति में सराबोर जन बिरले ही थे।

सायं स गोपभवनानि भवच्चरित्र-
गीतामृतप्रसृतकर्णरसायनानि ।
पश्यन् प्रमोदसरितेव किलोह्यमानो
गच्छन् भवद्भवनसन्निधिमन्वयासीत् ॥७॥

सायं स सन्ध्या के समय
गोप-भवनानि गोपों के घरों को (जो)
भवत्-चरित्र- आप ही के चरित्र के
गीत-अमृत-प्रसृत- गीतों के अमृत के प्रवाह में
कर्ण-रसायनानि (जो) कानों के लिए रसायन सदृश्य थे
पश्यन् देखते हुए
प्रमोद-सरिता-इव आनन्द की सरिता के मानो
किल-उह्यमान: (प्रवाह में) ही बहते हुए
गच्छन् भवत्- जाते हुए आपके
भवन-सन्निधिम्- भवन के समीप
अन्वयासीत् पहुंचे

सन्ध्या समय, जहां से कानों के लिए रसायन के सदृश्य आपके ही चरित्र के अमृतमय गान की ध्वनि सुनाई दे रही थी, ऐसे गोपों के घरों को, देखते हुए, अक्रूर आनन्द सरिता के प्रवाह में बहे जाते हुए, धीरे धीरे चल कर आपके ही भवन के समीप पहुंच गए।

तावद्ददर्श पशुदोहविलोकलोलं
भक्तोत्तमागतिमिव प्रतिपालयन्तम् ।
भूमन् भवन्तमयमग्रजवन्तमन्त-
र्ब्रह्मानुभूतिरससिन्धुमिवोद्वमन्तम् ॥८॥

तावत्-ददर्श उसी समय देखा
पशु-दोह- पशुओं के दोहन
विलोक-लोलं को देखने की लीला करते हुए
भक्त-उत्तम-आगतिम्- भक्त शिरोमणि के आने की
इव प्रतिपालयन्तम् मानो प्रतीक्षा करते हुए
भूमन् हे भूमन्!
भवन्तम्-अयम्- आपको इसने
अग्रजवन्तम्- बडे भाई के साथ
अन्त:-ब्रह्म-अनुभूति- अन्त:स्थले की ब्रह्मानुभूति के
रस-सिन्धुम्-इव-उद्वमन्तम् रसमय सागर को मानो उलीचते हुए

हे भूमन्! उसी समय अक्रूर ने आपको बडे भाई बलराम के साथ देखा। आप दोनों पशुओं के दोहन को उत्सुक्ता पूर्वक देखने की लीला कर रहे थे और अपने भक्त शिरोमणि (अक्रूर) की प्रतीक्षा करते हुए मानो रसमय सागर के समान आप स्वयं उनके अन्त:स्थल की ब्रह्मानुभूति को उलीच रहे थे।

सायन्तनाप्लवविशेषविविक्तगात्रौ
द्वौ पीतनीलरुचिराम्बरलोभनीयौ ।
नातिप्रपञ्चधृतभूषणचारुवेषौ
मन्दस्मितार्द्रवदनौ स युवां ददर्श ॥९॥

सायन्तन-आप्लव सायंकालीन स्नान से
विशेष-विविक्त- विशेष निर्मल हुए
गात्रौ द्वौ शरीर वाले आप दोनों
पीत-नील- पीले और नीले
रुचिर-अम्बर- सुन्दर वस्त्रों (के धारण से)
लोभनीयौ लोभनीय दोनों
न-अति-प्रपञ्च- नही अधिक आडम्बर के
धृत-भूषण पहने हुए आभूषण
चारु-वेषौ मनोहारी वेष वाले
मन्द्-स्मित- मधुर मुस्कान से
आर्द्र-वदनौ कोमल मुख वाले (आप दोनों को)
उसने
युवां ददर्श आप दोनों को देखा

अक्रूर ने सायंकालीन स्नान के कारण विशेष रूप से निर्मल शरीर वाले, पीले और नीले वस्त्रों को धारण किये हुए लोभनीय आकृति वाले, अधिक आडम्बर रहित आभूषण पहने हुए अत्यधिक मनोहारी वेष वाले तथा मधुर मुस्कान से कोमल मुख वाले आप दोनों को देखा।

दूराद्रथात्समवरुह्य नमन्तमेन-
मुत्थाप्य भक्तकुलमौलिमथोपगूहन् ।
हर्षान्मिताक्षरगिरा कुशलानुयोगी
पाणिं प्रगृह्य सबलोऽथ गृहं निनेथ ॥१०॥

दूरात्-रथात्- दूर पर ही रथ से
समवरुह्य उतर कर
नमन्तम्-एनम्- नमन करते हुए इसको
उत्थाप्य उठा कर
भक्तकुल-मौलिं- भक्तों के कुल के शिरोमणि को
अथ-उपगूहन् तब आलिङ्गन करके
हर्षात्- हर्ष से
मित-अक्षर-गिरा (और) थोडे अक्षरों के वचन से
कुशल-अनुयोगी कुशलता पूछ कर
पाणिं प्रगृह्य हाथ पकड कर
सबल:- अथ बलराम के सहित
गृहं निनेथ घर की ओर ले चले

आप दोनों को देख कर अक्रूर कुछ दूरी पर ही रथ से उतर गए। नमन करते हुए उन भक्तशिरोमणि को उठा कर आपने हृदय से लगा लिया और हर्षपूर्वक अल्प शब्दों में ही कुशल क्षेम पूछी। फिर बलराम और आप अक्रूर का हाथ पकड कर उन्हें अपने घर ले आए।

नन्देन साकममितादरमर्चयित्वा
तं यादवं तदुदितां निशमय्य वार्ताम् ।
गोपेषु भूपतिनिदेशकथां निवेद्य
नानाकथाभिरिह तेन निशामनैषी: ॥११॥

नन्देन साकम्- नन्द के साथ
अमित-आदरम्- अत्यन्त आदर सहित
अर्चयित्वा सत्कार करके
तं यादवं उस यादव (अक्रूर) को
तत्-उदितां उसके द्वारा कहे हुए
निशमय्य वार्ताम् सुन कर समाचार को
गोपेषु गोपों में
भूपति-निदेश-कथां राजा के आदेश की कथा को
निवेद्य निवेदन करके
नाना-कथाभि:- विभिन्न कथाओं से
इह तेन यहां उसके साथ
निशाम्-अनैषी: रात्रि बिताई

नन्द के साथ आपने उनका अत्यन्त आदर सत्कार किया। यादव अक्रूर के कहे हुए समाचारों को सुना और राजा के द्वारा गोपों के सम्मुख दिये हुए आदेशों का निवेदन किया। फिर अन्यान्य विभिन्न कथाओं से यहां उसके साथ रात्रि व्यतीत की।

चन्द्रागृहे किमुत चन्द्रभगागृहे नु
राधागृहे नु भवने किमु मैत्रविन्दे ।
धूर्तो विलम्बत इति प्रमदाभिरुच्चै-
राशङ्कितो निशि मरुत्पुरनाथ पाया: ॥१२॥

चन्द्रा गृहे चन्द्रा के घर में
किमुत या फिर
चन्द्रभगा गृहे चन्द्रभगा के घर में
नु या कि
राधा गृहे नु राधा के घर में
भवने किमु मैत्रविन्दे अथवा मित्रवृन्दा के यहां
धूर्त: विलम्बते कपटी देर कर रहा है
इति प्रमदाभि:- इस प्रकार युवतियों ने
उच्चै: आशङ्कित: स्पष्टता से आशङ्का की
निशि रात्रि में
मरुत्पुरनाथ हे मरुत्पुरनाथ!
पाया: रक्षा करें

स्पष्ट रूप से गोपियां आप पर आशङ्का करने लगीं, कि आप जैसा धूर्त न जाने इतनी देर तक किसके घर में है, चन्द्रा या चन्द्रभागा या राधा या फिर मित्रवृन्दा? हे मरुत्पुरनाथ! रक्षा करें।

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