Shriman Narayaneeyam

  दशक ६४ | प्रारंभ | दशक ६६ English

दशक ६५

गोपीजनाय कथितं नियमावसाने
मारोत्सवं त्वमथ साधयितुं प्रवृत्त: ।
सान्द्रेण चान्द्रमहसा शिशिरीकृताशे
प्रापूरयो मुरलिकां यमुनावनान्ते ॥१॥

गोपीजनाय गोपियों के लिए
कथितं (जो) कहा था
नियम-अवसाने (व्रत के) नियमों के समाप्त होने पर
मार-उत्सवं प्रेम उत्सव को
त्वम्-अथ आप तब
साधयितुं प्रवृत्त: क्रियान्वित करने के लिए प्रस्तुत
सान्द्रेण चान्द्रमहसा स्निग्ध चांदनी से चन्द्रमा की
शिशिरी-कृत-आशे (जब) शीतल हो गई थीं दिशाएं
प्रापूरय: मुरलिकां परिपूर्ण कर रहे थे मुरली को
यमुना-वन-अन्ते यमुना के वन की सीमा पर

गोपियों के व्रत के नियम आदि समाप्त हो जाने पर आपने जिस प्रेम उत्सव के लिए उनसे कहा था, उसको क्रियान्वित करने के लिए आप प्रस्तुत हुए। एक रात जब चन्द्रमा की स्निग्ध चांदनी चारों दिशाओं को शीतल कर रही थी, तब यमुना वन की सीमा पर आप मुरली को स्वर से परिपूरित कर रहे थे।

सम्मूर्छनाभिरुदितस्वरमण्डलाभि:
सम्मूर्छयन्तमखिलं भुवनान्तरालम् ।
त्वद्वेणुनादमुपकर्ण्य विभो तरुण्य-
स्तत्तादृशं कमपि चित्तविमोहमापु: ॥२॥

सम्मूर्छनाभि:- सम्मूर्छनाओं से (स्वर के उतार चढाव से)
उदित- निकले
स्वरमण्डलाभि: स्वर मण्डलों से
सम्मूर्छयन्तम्- सम्मोहित हुए
अखिलं समस्त
भुवन-अन्तरालम् भुवन मण्डल के
त्वत्-वेणु-नादम्- आपकी मुरली की धुन को
उपकर्ण्य विभो सुन कर हे विभो!
तरुण्य:-तत्-तादृशं तरुणी जन उस प्रकार की
कम्-अपि किसी भी
चित्त-विमोहम्-आपु: चित्त के सम्मोह को प्राप्त हो गईं

स्वरों के उतार चढाव वाली सम्मूर्छनाओं से उत्पन्न हुई स्वर मण्डली से समस्त भुवन सम्मोहित हो गया। हे विभो! आपकी मुरली की उस अवर्णनीय धुन को सुन कर तरुणियां भी उसी प्रकार के किसी (अवर्णनीय) चित्त के विमोह से विमुग्ध हो उठीं।

ता गेहकृत्यनिरतास्तनयप्रसक्ता:
कान्तोपसेवनपराश्च सरोरुहाक्ष्य: ।
सर्वं विसृज्य मुरलीरवमोहितास्ते
कान्तारदेशमयि कान्ततनो समेता: ॥३॥

ता: वे (जो)
गेह-कृत्य-निरता:- गृह कार्यों में संलग्न थीं
तनय-प्रसक्ता: (या) बच्चों का लालन कर रही थीं
कान्त-उपसेवन-परा:-च और पतियों की सेवा में तत्पर थीं
सरोरुह-आक्ष्य: (वे) कमल्नयनी
सर्वं विसृज्य सब कुछ छोड कर
मुरली-रव- मुरली के स्वर से
मोहिता:-ते मोहित हुई वे
कान्तार-देशम्- वन प्रदेश को
अयि कान्त-तनो अयि कान्तिमान!
समेता: आ गईं

हे कान्तिमान! मुरली के स्वर से विमोहित हुई, वे सभी कमलनयनी गोपिकाएं जो नाना भांति के गृह कार्यों में व्यस्त थीं, अपने शिशुओं का लालन कर रही थीं अथवा अपने पतियों की सेवा में तत्पर थीं, सब कुछ छोड कर, वन प्रदेश में आ गईं।

काश्चिन्निजाङ्गपरिभूषणमादधाना
वेणुप्रणादमुपकर्ण्य कृतार्धभूषा: ।
त्वामागता ननु तथैव विभूषिताभ्य-
स्ता एव संरुरुचिरे तव लोचनाय ॥४॥

काश्चित्- कोई
निज-अङ्ग- अपने अङ्गो को
परिभूषणम्- आभूषणों से
आदधाना सजाती हुई
वेणु-प्रणादम्- मुरली के नाद को
उपकर्ण्य सुन कर
कृत-अर्ध-भूषा: करके अधूरी प्रसज्जा
त्वाम्-आगता: आपके पास आगई
ननु तथा-एव नि:सन्देह वैसे ही
विभूषिताभ्य: विभूषित गोपियों से
ता एव वे ही
संरुरुचिरे (अधिक) सुन्दर लगीं
तव लोचनाय आपके नेत्रों को

कुछ गोपिकाएं आभूषणों से अपने अङ्गों का प्रसाधन कर रही थी। मुरली की तान को सुनते ही अधूरी प्रसज्जा किए हुए ही वे आपके पास आ गईं। नि:सन्देह विभूषित गोपियों की अपेक्षा वे ही आपके नेत्रों को अधिक सुन्दर लग रही थीं।

हारं नितम्बभुवि काचन धारयन्ती
काञ्चीं च कण्ठभुवि देव समागता त्वाम् ।
हारित्वमात्मजघनस्य मुकुन्द तुभ्यं
व्यक्तं बभाष इव मुग्धमुखी विशेषात् ॥५॥

हारं नितम्ब-भुवि हार को कटि प्रदेश में
काचन धारयन्ती कोई धारण कर के
काञ्चीं च करघनी को और
कण्ठ-भुवि कण्ठ प्रदेश में
देव हे देव!
समागता त्वाम् आ गई पास आपके
हारित्वम्- मनोहरता
आत्म-जघनस्य अपनी जङ्घा की
मुकुन्द तुभ्यं हे मुकुन्द आपके लिए
व्यक्तं बभाष इव स्पष्टता से कहते हुए सी
मुग्धमुखी मुग्धमुखी
विशेषात् विशेषता से

हे देव! कोई एक गोपिका हार कटि प्रदेश में करके और करघनी कण्ठ प्रदेश में धारण करके आपके पास चली आई। हे मुकुन्द! मानो वह मुग्धमुखी आपके समक्ष स्पष्ट रूप से अपनी जङ्घाओं की विशेष मनोहरता को व्यक्त कर रही हो।

काचित् कुचे पुनरसज्जितकञ्चुलीका
व्यामोहत: परवधूभिरलक्ष्यमाणा ।
त्वामाययौ निरुपमप्रणयातिभार-
राज्याभिषेकविधये कलशीधरेव ॥६॥

काचित् कुचे कोई कुचों पर
पुन:-असज्जित- फिर न धारण करके
कञ्चुलीका कञ्चुलीका को
व्यामोहत: विमोहित हुई
परवधूभि:- अन्य वधुओं के द्वारा
अलक्ष्यमाणा नहीं देखी जाती हुई
त्वाम्-आययौ आपके पास आ गई
निरुपम-प्रणय- अतुलनीय प्रणय
अतिभार- के गम्भीर भार का
राज्य-अभिषेक-विधये (आपके) राज्याभिषेक के करने के लिए
कलशीधर-इव कलशों को धारण किए हुए के समान

अन्य एक विमोहित हुई गोपिका अपने कुचों पर कञ्चुलीका धारण न किए हुए ही आपके पास आ गई। उसको अन्य गोपिकाओं ने नहीं देखा क्योंकि वे सब भी विमोहित थीं। ऐसा प्रतीत होता था मानों वह आपका राज्याभिषेक करने के लिए प्रस्तुत वक्ष रूपी कलशों को धारण किए हुए हो, जो अतुलनीय प्रणय के अतिशय भार का वहन कर रही हो।

काश्चित् गृहात् किल निरेतुमपारयन्त्य-
स्त्वामेव देव हृदये सुदृढं विभाव्य ।
देहं विधूय परचित्सुखरूपमेकं
त्वामाविशन् परमिमा ननु धन्यधन्या: ॥७॥

काश्चित् गृहात् कई (गोपियां) घर से
किल निरेतुम्- सर्वथा निकलने में
अपारयन्त्य: असमर्थ होने के कारण
त्वाम्-एव देव आप ही को हे देव!
हृदये सुदृढं विभाव्य मन में प्रगाढता से स्मरण करके
देहं विधूय शरीर को त्याग कर
पर-चित्-सुख- परम चित आनन्द
रूपम्-एकं त्वाम्- स्वरूप एकमात्र आप में
आविशन् समा गईं
परम्-इमा:-ननु अत्यन्त ये (गोपियां) अवश्यमेव
धन्य-धन्या: धन्य धन्य हैं

कुछ गोपियां घर से निकलने में सर्वथा असमर्थ थीं। हे देव! इस कारण वे प्रगाढता से मन में आपका ही स्मरण करने लगीं। फलस्वरूप उन्होने आपना शरीर त्याग दिया और परम चित्त आनन्दमय एकमात्र आपमें समा गईं। नि:सन्देह वे अत्यन्त ही धन्य हैं।

जारात्मना न परमात्मतया स्मरन्त्यो
नार्यो गता: परमहंसगतिं क्षणेन ।
तं त्वां प्रकाशपरमात्मतनुं कथञ्चि-
च्चित्ते वहन्नमृतमश्रममश्नुवीय ॥८॥

जारात्मना पर पुरुष प्रेम (की भावना) से
न परमात्मतया न कि परमात्मा (की भावना) से
स्मरन्त्य: (आपका) स्मरण करते हुए
नार्य: गता: (उन) नारियों ने पा लिया
परमहंसगतिं परमहंस की गति को
क्षणेन तं त्वां क्षण भर में, उन आपको
प्रकाश-परमात्म-तनुं प्रकाशमान परमात्म विग्रहवान को
कथञ्चित्- जिस किसी भी प्रकार
चित्ते वहन्- चित्त में धारण करके
अमृतम्- अमृतत्व को
अश्रमम्-अश्नुवीय अनायास ही प्राप्त कर लूं

उन पूण्यवती गोपियों ने पर-पुरुष-प्रेम की भावना से, न कि परमात्मा की भावना से आपका स्मरण किया। उस पर भी क्षण भर में उन्हे परमहंस की गति प्राप्त हो गई। प्रकाशमान परमात्म विग्रहवान आपको, जिस किसी भी प्रकार से चित्त में धारण कर के मैं भी अनायास ही अमृतत्व को प्राप्त कर लूं। ऐसी कृपा करें।

अभ्यागताभिरभितो व्रजसुन्दरीभि-
र्मुग्धस्मितार्द्रवदन: करुणावलोकी ।
निस्सीमकान्तिजलधिस्त्वमवेक्ष्यमाणो
विश्वैकहृद्य हर मे पवनेश रोगान् ॥९॥

अभ्यागताभि:- आई हुई (गोपियों) के द्वारा
अभित: सब ओर से
व्रजसुन्दरीभि:- व्रज की सुन्दरियों के द्वारा
मुग्ध-स्मित-आर्द्र-वदन: मधुर मुस्कान से कान्तिमान मुख वाले
करुणा-अवलोकी करुणा मयी दृष्टि वाले
निस्सीम-कान्ति- अनन्त कान्ति वाले
जलधि:-त्वम्- समुद्र मय आप
अवेक्ष्यमाण: देखे गए
विश्वैकहृद्य हे विश्व विमोहक!
हर मे हर ले मेरे
पवनेश हे पवनेश!
रोगान् रोगों को

सब ओर से आ आ कर एकत्रित हुई व्रज की सुन्दरियों ने मधुर मुस्कान से उज्ज्वल मुख वाले, करुणामयी दृष्टि वाले, अनन्त कान्ति के समुद्र स्वरूप आपको देखा। हे विश्वविमोहक पवनेश! मेरे रोगों को हर लें।

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