Shriman Narayaneeyam

दशक 50 | प्रारंभ | दशक 52

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दशक ५१

कदाचन व्रजशिशुभि: समं भवान्
वनाशने विहितमति: प्रगेतराम् ।
समावृतो बहुतरवत्समण्डलै:
सतेमनैर्निरगमदीश जेमनै: ॥१॥

कदाचन एक बार
व्रजशिशुभि: समं व्रज के बालकों के साथ
भवान् वन-अशने आप वन में खाने के लिये
विहित-मति: निश्चय मन में कर के
प्रगेतराम् समावृत: भोर बेला में घिरे हुए
बहुतर-वत्स-मण्डलै: बहुत से गोवत्सों के समूह से
सतेमनै:-निरगमत्- (ले कर) खाद्य व्यञ्जन निकल पडे
ईश जेमनै: हे ईश! भात भी (ले कर)

हे ईश! व्रज के बालकों के साथ वन में भोजन करने का मन में विचार कर के, एक बार, भोर बेला में, बहुत से गोवत्सों के समूहों से घिरे हुए, स्वादु खाद्य व्यञ्जन और भात ले कर निकल पडे।

विनिर्यतस्तव चरणाम्बुजद्वया-
दुदञ्चितं त्रिभुवनपावनं रज: ।
महर्षय: पुलकधरै: कलेबरै-
रुदूहिरे धृतभवदीक्षणोत्सवा: ॥२॥

विनिर्यत: तव जाते हुए आपके
चरण-अम्बुज-द्वयात्- चरण कमल युगल से
उदञ्चितं उठी हुई
त्रिभुवन-पावनं रज: त्रिभुवन को पावन करने वाली धूल को
महर्षय: पुलकधरै: महर्षियों ने रोमञ्चित होते हुए
कलेबरै:-उदूहिरे (अपने) शरीरों पर ग्रहण किया
धृत-भवत्-ईक्षण- धारण कर के आपके दर्शन को
उत्सवा: उत्सव के समान

चलने से आपके चरण कमल युगल से उठी हुई त्रिभुवन को पावन करने वाली धूल को ऋषियों ने पुलकित हो कर अपने शरीरों पर धारण किया और आपके दर्शन का उत्सव मनाया।

प्रचारयत्यविरलशाद्वले तले
पशून् विभो भवति समं कुमारकै: ।
अघासुरो न्यरुणदघाय वर्तनी
भयानक: सपदि शयानकाकृति: ॥३॥

प्रचारयति- चराते हुए
अविरल-शाद्वले तले घनी घास वाले भूतल पर
पशून् विभो पशुओं को हे विभो!
भवति समं कुमारकै: आप के साथ कुमार भी
अघासुर: न्यरुणत्- अघासुर ने रोक लिया
अघाय वर्तनी पपाप कर्म करने के लिये मार्ग को (जब)
भयानक: सपदि भयंकर अचानक
शयानक-आकृति: अजगर की आकृति में

हे विभो! जब आप कुमारों के साथ घनी घास वाले भूतल पर पशुओं को चरा रहे थे उस समय अघासुर ने अजगर की भयंकर आकृति धारण कर पाप कर्म करने के लिये मार्ग रोक लिया।

महाचलप्रतिमतनोर्गुहानिभ-
प्रसारितप्रथितमुखस्य कानने ।
मुखोदरं विहरणकौतुकाद्गता:
कुमारका: किमपि विदूरगे त्वयि ॥४॥

महाचल-प्रतिम-तनो:- पर्वत के समान तन वाला
गुहा-निभ-प्रसारित- गुफा के समान फैलाये हुए
प्रथित-मुखस्य बडे मुख वाले उसको
कानने वन में
मुख-उदरं मुख के भीतर
विहरण-कौतुकात्- विहार करने के लिये उत्सुक
गता: कुमारका: गये कुमार गण
किम्-अपि कुछ भी
विदूरगे त्वयि दूर गये थे आप

आप कुछ दूर आगे चले गये थे। उसके विशाल तन को पर्वत, और फैलाये हुए विशाल मुख को कन्दरा समझ कर, वे वन में विचरण करने के कुतुहल से कुमार उसमें घुस गये।

प्रमादत: प्रविशति पन्नगोदरं
क्वथत्तनौ पशुपकुले सवात्सके ।
विदन्निदं त्वमपि विवेशिथ प्रभो
सुहृज्जनं विशरणमाशु रक्षितुम् ॥५॥

प्रमादत: प्रविशति प्रमाद से घुस जाने से
पन्नग-उदरं अजगर के पट में
क्वथत्-तनौ जलते हुए तन वाले
पशुपकुले सवात्सके गोपकुमारों के बछडों सहित
विदन्-इदम् त्वम्-अपि जानते हुए यह आप भी
विवेशिथ प्रभो घुस गये हे प्रभो!
सुहृत्-जनं मित्र जनों
विशरणम्- के शरण
आशु रक्षितुम् तुरन्त रक्षा करने के लिये

बछडों के सहित गोपकुमारों के प्रमादवश अजगर के पेट में घुस जाने पर उनके तन जलने लगे। मित्र जनों के शरण हे प्रभो! यह सब जानते हुए आप भी तुरन्त उनकी रक्षा करने के लिये अन्दर घुस गये।

गलोदरे विपुलितवर्ष्मणा त्वया
महोरगे लुठति निरुद्धमारुते ।
द्रुतं भवान् विदलितकण्ठमण्डलो
विमोचयन् पशुपपशून् विनिर्ययौ ॥६॥

गल-उदरे गले के भीतर में
विपुलित-वर्ष्मणा बढाते हुए शरीर से
त्वया आपके द्वारा
महोरगे लुठति महान अजगर के छटपटाने से
निरुद्ध-मारुते रुक जाने से प्राण वायु के
द्रुतं भवान् शीघ्रता से आपने
विदलित-कण्ठ-मण्डल: चीरते हुए कण्ठ प्रदेश को
विमोचयन् पशुप-पशून् छुडा कर गोपों और बछडों को
विनिर्ययौ निकल आए

उस विशाल अजगर के गले के भीतर आपने अपने शरीर को बढा लिया जिससे उसकी प्राण वायु रुक गई और वह छटपटाने लगा। तब शीघ्रता से आपने उसके कण्ठ प्रदेश को फाड डाला और गोपों और बछडों को छुडा कर निकल आए।

क्षणं दिवि त्वदुपगमार्थमास्थितं
महासुरप्रभवमहो महो महत् ।
विनिर्गते त्वयि तु निलीनमञ्जसा
नभ:स्थले ननृतुरथो जगु: सुरा: ॥७॥

क्षणं दिवि क्षण मात्र के लिये आकाश में
त्वत्-उपगम-अर्थम्-आस्थितं आपके निकलने की प्रतीक्षा में रुका रहा
महा-असुर-प्रभवम्- महान असुर से निकला हुआ
अहो मह: महत् अहो! महान तेज
विनिर्गते त्वयि तु निकल जाने पर आपके तब फिर
निलीनम्-अञ्जसा विलीन हो गया तुरन्त (आप ही में)
नभ:-स्थले आकाश स्थल में
ननृतु:-अथ: नाचने लगे तब
जगु: सुरा: गाने लगे देवता

अहो! उस विशाल असुर से निकला हुआ महान तेज क्षण मात्र के लिये आपके निकलने की प्रतीक्षा में आकाश में रुका रहा। आपके निकलते ही वह आप ही में विलीन हो गया। आकाश मे स्थित देवता नाचने और गाने लगे।

सविस्मयै: कमलभवादिभि: सुरै-
रनुद्रुतस्तदनु गत: कुमारकै: ।
दिने पुनस्तरुणदशामुपेयुषि
स्वकैर्भवानतनुत भोजनोत्सवम् ॥८॥

सविस्मयै: विस्मय सहित
कमलभव-आदिभि: ब्रह्मा आदि
सुरै:-अनुद्रुत: देवताओं के द्वारा पीछा करते हुए
तदनु गत: उसके बाद आप चले गये
कुमारकै: दिने पुन:- गोप कुमारों के साथ जब दिन फिर से
तरुण-दशाम्-उपेयुषि तरुण दशा को प्राप्त हुआ (मध्याह्न हुआ)
स्वकै: भवान्- स्वजनों के साथ आपने
अतनुत भोजन-उत्सवम् प्रारम्भ किया भोजनोत्सव

ब्रह्मा आदि देवता सविस्मय आपको देखते हुए आपके पीछे चलने लगे। दिन के तरुण दशा प्राप्त करने पर, अर्थात, मध्याह्न होने पर, आप गोप कुमारों और स्वजनों के साथ चले गये और भोजनोत्सव प्रारम्भ किया।

विषाणिकामपि मुरलीं नितम्बके
निवेशयन् कबलधर: कराम्बुजे ।
प्रहासयन् कलवचनै: कुमारकान्
बुभोजिथ त्रिदशगणैर्मुदा नुत: ॥९॥

विषाणिकाम्-अपि सींग और
मुरलीं नितम्बके मुरली को कटि प्रदेश में
निवेशयन् खोंस कर
कबलधर: कराम्बुजे ग्रास ले कर करकमल में
प्रहासयन् हंसाते हुए
कलवचनै: हास्यपूर्ण बातों से
कुमारकान् बुभोजिथ कुमारों को, आपने खाया
त्रिदशगणै: देवों के द्वारा
मुदा नुत: मोद से स्तुति किये जाते हुए

आपने सींग और मुरली को अपने कटि प्रदेश में खोंस लिया और करकमल में ग्रास ले कर हास्यपूर्ण बातों से कुमारों को हंसाते हुए खाना आरम्भ किया। प्रमुदित देवगण आपकी स्तुति करने लगे।

सुखाशनं त्विह तव गोपमण्डले
मखाशनात् प्रियमिव देवमण्डले ।
इति स्तुतस्त्रिदशवरैर्जगत्पते
मरुत्पुरीनिलय गदात् प्रपाहि माम् ॥१०॥

सुख-अशनम् तु -इह यहां तो सुख से भोजन करना
तव गोप-मण्डले आपका गोप मण्डली के बीच
मख-अशनात् यज्ञ भोजन से (अधिक)
प्रियम्-इव प्रिय ही है
देव-मण्डले देव मण्डल में
इति स्तुत:-त्रिदशवरै:- इस प्रकार स्तुतित देवों के द्वारा
जगत्पते हे जगत्पते!
मरुत्पुरीनिलय मरुत्पुरी निवासी!
गदात् प्रपाहि माम् रोगों से रक्षा करें मेरी

' यहां गोप मण्डली के बीच भोजन करना ही आपको देव मण्डल में यज्ञ भोजन करने से अधिक प्रिय है'। हे जगत्पति! इस प्रकार देवों ने आपकी स्तुति की। हे मरुत्पुरी निवासिन! रोगों से मेरी सुरक्षा करें।

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