Shriman Narayaneeyam

  दशक २३ | प्रारंभ | दशक २५ English

दशक २४

हिरण्याक्षे पोत्रिप्रवरवपुषा देव भवता
हते शोकक्रोधग्लपितधृतिरेतस्य सहज: ।
हिरण्यप्रारम्भ: कशिपुरमरारातिसदसि
प्रतिज्ञमातेने तव किल वधार्थं मधुरिपो ॥१॥

हिरण्याक्षे (हते) हिरण्याक्ष के
पोत्रि-प्रवर-वपुषा वराह की उत्तम मूर्ति के द्वारा
देव भवता हे देव! आपके द्वारा
हते मारे जाने पर
शोक-क्रोध-ग्लपित-धृति:- शोक और क्रोध से आच्छादित बुद्धि वाले
एतस्य सहज: इसके भाई
हिरण्य-प्रारम्भ: कशिपु:- हिरण्य से आरम्भ कशिपु:ने
अमर-अराति-सदसि देवों के शत्रु (असुरों) की सभा में
प्रतिज्ञाम्-आतेने प्रतिज्ञा को किया
तव किल वधार्थं आपके निश्चय ही वध के लिये
मधुरिपो हे मधुरिपू!

अति उत्तम वराह स्वरूप धारण कर के जब आपने हिरण्याक्ष को मार डाला तब उसका भाई हिरण्यकशिपु: शोक और क्रोध से विह्वल हो कर मति खो बैठा। हे मधुरिपु! तब राक्षसों की सभा में, उसने आपको मार डालने की प्रतिज्ञा की।

विधातारं घोरं स खलु तपसित्वा नचिरत:
पुर: साक्षात्कुर्वन् सुरनरमृगाद्यैरनिधनम् ।
वरं लब्ध्वा दृप्तो जगदिह भवन्नायकमिदं
परिक्षुन्दन्निन्द्रादहरत दिवं त्वामगणयन् ॥२॥

विधातारं घोरं ब्रह्मा जी को, घोर
स खलु तपसित्वा उसने निश्चय ही तपस्या करके
न-चिरत: पुर: साक्षात्-कुर्वन् शीघ्र ही सामने साक्षात कर के
सुर-नर-मृग-आद्यै:- देव, नर और पशुओं आदि के द्वारा
अनिधनं वरं लब्ध्वा न मारे जाने का वर ले कर
द्प्त: गर्वित
जगत्-इह जगत यह
भवन्-नायकम्-इदं आप जिसके नायक हैं
परिक्षुन्दन्- पीडित करते हुए
इन्द्रात्-अहरत् दिवं इन्द्र से छीन लिया स्वर्ग को
त्वाम्-अगण्यन् आपकी अवहेलना करते हुए

उसने निश्चय ही घोर तपस्या कर के शीघ्र ही ब्रह्मा जी को अपने सामने उपस्थित कर लिया। देव मनुष्य अथवा पशु किसी के भी द्वारा न मारे जाने का वर प्राप्त कर के वह गर्वित हो उठा। इस जगत के नियन्ता आप की अवहेलना करते हुए उसने इस जगत को पीडित कर दिया और इन्द्र से उसका देवलोक छीन लिया।

निहन्तुं त्वां भूयस्तव पदमवाप्तस्य च रिपो-
र्बहिर्दृष्टेरन्तर्दधिथ हृदये सूक्ष्मवपुषा ।
नदन्नुच्चैस्तत्राप्यखिलभुवनान्ते च मृगयन्
भिया यातं मत्वा स खलु जितकाशी निववृते ॥३॥

निहन्तुं त्वां भूय:- मारने के लिये आप को, फिर
तव पदम्-अवाप्तस्य आपके निवास पर पहुंचे हुए उसके
च रिपो:-बहिर्दृष्टे:- और उस शत्रु के देह्चक्षुओं से
अन्तर्दधिथ (आप) अन्तर्धान हो गये
हृदये सूक्ष्म-वपुषा हृदय में सूक्ष्म शरीर के द्वारा
नन्दन्-उच्चै:-तत्र-अपि- ऊंचे स्वर मे चीत्कार करते हुए, वहां भी
अखिल-भुवन्-अन्ते च और समस्त भुवनों के अन्त तक
मृगयन् खोजते हुए
भिया यातं मत्वा डर से भाग गया जान कर (आपको)
स खलु जितकाशी वह निश्चय ही विजयी मान कर (स्वयं को)
निववृते लौट गया

आपको मारने के लिये वह आपके निवास स्थान वैकुण्ठ को पहुंच गया। आप अपने शत्रु के देह चक्षुओं से ओझल हो कर सूक्ष्म रूप से उसके हृदय में प्रवेश कर गये। तीव्र चीत्कार के साथ वह आपको भुवनों के अन्त तक खोजता रहा। फिर आपको डर से भागा हुआ और स्वयं को विजयी मान कर वह लौट गया।

ततोऽस्य प्रह्लाद: समजनि सुतो गर्भवसतौ
मुनेर्वीणापाणेरधिगतभवद्भक्तिमहिमा ।
स वै जात्या दैत्य: शिशुरपि समेत्य त्वयि रतिं
गतस्त्वद्भक्तानां वरद परमोदाहरणताम् ॥४॥

तत:-अस्य तब उसके
प्रह्लाद: समजनि सुत: प्रह्लाद पैदा हुआ पुत्र
गर्भवसतौ (जो) गर्भ में रहते हुए ही
मुने:-वीणा-पाणे:- मुनि नारद से
अधिगत- सीख गया था
भवत्-भक्ति-महिमा आपकी भक्ति की महिमा को
स वै जात्या दैत्य: वह जाति से दैत्य होते हुए भी
शिशु:-अपि बालक होते हुए भी
समेत्य त्वयि रतिं ग्रहण करते हुए आपमें प्रेम को
गत: त्वत् भक्तानाम् पा गया आपके भक्तों में
वरद हे वरद!
परम-उदाहरणताम् (गत:) परम उदाहरणता को

तदनन्तर, उसके प्रह्लाद नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ। उसने गर्भ में रहते हुए ही वीणा पाणि नारद जी से आपकी भक्ति की महिमा का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। हे वरद! दैत्य वंश का होते हुए भी, बाल काल में ही आपका प्रेमी हो कर, वह आपके भक्तों में परम भक्त का उदाहरण बन गया।

सुरारीणां हास्यं तव चरणदास्यं निजसुते
स दृष्ट्वा दुष्टात्मा गुरुभिरशिशिक्षच्चिरममुम् ।
गुरुप्रोक्तं चासाविदमिदमभद्राय दृढमि-
त्यपाकुर्वन् सर्वं तव चरणभक्त्यैव ववृधे ॥ ५ ॥

सुरारीणां हास्यं असुरों के लिये हास्यास्पद
तव चरण-दास्यं आपके चरणों की दासता
निज-सुते स दृष्ट्वा अपने पुत्र में उसने देख कर
दुष्टात्मा दुष्टात्मा उसने
गुरुभि:-अशिशिक्षत्- गुरुओं के द्वारा सिखाया
चिरम्-अमुम् बहुत समय तक इसको
गुरु-प्रोक्तं च-असौ- और गुरु के द्वारा कहा गया यह
इदम्-इदम्-अभद्राय दृढम्-इति यह, यह सब अशुभ है निश्चित ऐसा (करके)
अपाकुर्वन् सर्वं त्याग कर सब को
तव चरण भक्त्या-एव आपके चरणो की भक्ति से ही
ववृधे बढता गया

असुरों के लिये हास्यास्पद आपके चरणो की दासता को अपने पुत्र में देख कर, उस दुष्टात्मा हिरण्यकशिपु ने गुरुओं के द्वारा प्रह्लाद को बहुत समय तक शिक्षा दिलवाई। गुरुओं के द्वारा दिया गया सारा ज्ञान अकल्याण्कारी है, ऐसा निश्चय करके उन सब का त्याग कर के वह आपके चरणों की भक्ति के साथ बढता रहा।

अधीतेषु श्रेष्ठं किमिति परिपृष्टेऽथ तनये
भवद्भक्तिं वर्यामभिगदति पर्याकुलधृति: ।
गुरुभ्यो रोषित्वा सहजमतिरस्येत्यभिविदन्
वधोपायानस्मिन् व्यतनुत भवत्पादशरणे ॥६॥

अधीतेषु श्रेष्ठं किम्- पढे हुए में श्रेष्ठ क्या है
इति परिपृष्टे- यह पूछे जाने पर
अथ तनये तब पुत्र के
भवत्-भक्तिं वर्याम्- आपकी भक्ति की श्रेष्ठता को
अभिगदति कहे जाने पर
पर्याकुल-धृति: विचलित बुद्धि
गुरुभ्य: रोषित्वा गुरुओं पर क्रोध करके
सहज-मति:-अस्य- सहज स्वभाव है इसका
इति-अभिविदन् ऐसा जान कर
वधोपायान्- वध करने के उपायों को
अस्मिन् व्यतनुत इस के ऊपर प्रयोग करने लगा
भवत्-पाद-शरणे आपके चरणों के शरणागत पर

'पढे हुए पाठ में श्रेष्ठ क्या है' ऐसा पूछे जाने पर प्रह्लाद ने आपकी भक्ति को ही सर्वोत्तम बताया। इससे विचलित बुद्धि हिरण्यकशिपु गुरुओं पर बहुत क्रोधित हुआ। गुरुओं से यह जान कर कि यह प्रह्लाद का सहज स्वभाव है, वह आपके चरणों की शरण में आए प्रह्लाद पर उसके वध के उपायों का, प्रयोग करने लगा।

स शूलैराविद्ध: सुबहु मथितो दिग्गजगणै-
र्महासर्पैर्दष्टोऽप्यनशनगराहारविधुत: ।
गिरीन्द्रवक्षिप्तोऽप्यहह! परमात्मन्नयि विभो
त्वयि न्यस्तात्मत्वात् किमपि न निपीडामभजत ॥७॥

स: वह
शूलै:-आविद्ध: सुबहु त्रिशूलों से बिंधवाया गय अनेक बार
मथित: दिग्गज-गणै:- मर्दित करवाया गया दिग्गज हाथियों के द्वारा
महा-सर्पै:-दष्ट:- बडे सर्पों के द्वारा दंशित करवाया गया
अपि-अनशन- (और) भी निराहार रखा गया
गर-आहार-विधुत: विषाक्त भोजन करवाया गया
गिरीन्द्र-अवक्षिप्त:- गिरीन्द्रों के ऊपर से फिंकवाया गया
अपि-अहह और भी ओहोहो!
परमात्मन्-अयि विभो हे विश्वव्यापक प्रभु!
त्वयि न्यस्त-आत्मत्वात् आपमे स्थिर कर लिया था मन, इस कारण से
किम्-अपि न निपीडाम्- कुछ भी पीडा को नहीं
अभजत् अनुभव किया

प्रह्लाद को अनेक बार शूलों से बिंधवाया गया, विशाल हाथियों से मर्दित करवाया गया, बडे बडे सर्पों से दंशित करवाया गया, निराहा रखा गया, विषाक्त भोजन करवाया गया, गिरीन्द्रों के ऊपर से गिरवाया गया। हे विश्वव्यापक प्रभु! आश्चर्य है कि आपमें मन को स्थिर कर लेने के कारण उसने थोडी सी भी पीडा का अनुभव नहीं किया।

तत: शङ्काविष्ट: स पुनरतिदुष्टोऽस्य जनको
गुरूक्त्या तद्गेहे किल वरुणपाशैस्तमरुणत् ।
गुरोश्चासान्निध्ये स पुनरनुगान् दैत्यतनयान्
भवद्भक्तेस्तत्त्वं परममपि विज्ञानमशिषत् ॥८॥

तत: शङ्का-आविष्ट: स: पुन:- तब शंका से वशीभूत उसने फिर से
अति-दुष्ट:-अस्य जनक: अत्यन्त दुष्ट इसके पिता ने
गुरु-उक्त्या गुरु के कहने पर
तत्-गेहे किल उसके गृह में ही
वरुण पाशै: वरुण पाशों से
तम्-अरुणत् उसको बांध दिया
गुरो:-च-असान्निध्ये और गुरु के समीप न होने पर
स: पुन:- वह (प्रह्लाद) फिर से
अनुगान् दैत्य-तनयान् संग थे जो दैत्य पुत्र, (उनको)
भवत्-भक्ते:-तत्त्वम् आपकी भक्ति के तत्व को
परमम्-अपि विज्ञानम्- और उत्तम ज्ञान (ब्रह्म ज्ञान) की
अशिषत् शिक्षा देता था

तब, उसके सशंक और अति दुष्ट पिता ने, गुरु के कहने पर, गुरु के ही घर पर, उसे वरुण पाशों से बंधवा दिया। वहां, जब भी गुरु समीप नहीं होते थे, तब प्रह्लाद अपने संगी दैत्य पुत्रों को आपकी भक्ति की महिमा और उत्तम ब्रह्म ज्ञान की शिक्षा देता था।

पिता शृण्वन् बालप्रकरमखिलं त्वत्स्तुतिपरं
रुषान्ध: प्राहैनं कुलहतक कस्ते बलमिति ।
बलं मे वैकुण्ठस्तव च जगतां चापि स बलं
स एव त्रैलोक्यं सकलमिति धीरोऽयमगदीत् ॥९॥

पिता शृण्वन् पिता ने सुन कर
बाल-प्रकरम्-अखिलं समस्त बालक गण को
त्वत्-स्तुति-परं (जो) आपकी स्तुति कर रहे थे
रुषान्ध: क्रोध से अन्धे हो कर,
प्राह-एनं कहा इसको
कुलहतक क:-ते बलम्-इति कुल द्रोही! तेरा बल क्या है! इस प्रकार
बलं मे वैकुण्ठ:- बल मेरे विष्णु हैं
तव च आपके भी
जगतां च-अपि स बलं और समस्त जगत के भी बल हैं
स एव त्रैलोक्यं सकलम्- वह ही सारा त्रैलोक्य हैं
इति धीर:-अयम्-अगदीत् इस प्रकार इस धीर ने कहा

पिता ने जब सुना कि पूरा बाल समूह आपकी स्तुति करने में लीन है, तब क्रोध से अन्धे हो कर उसने प्रह्लाद को कहा, 'कुल द्रोही! तेरा बल क्या है?' इस पर धीर और निडर प्रह्लाद ने कहा, 'मेरे बल विष्णु है, और आपके भी, और सारे जगत के भी। वे ही त्रिलोक स्वरूप हैं।'

अरे क्वासौ क्वासौ सकलजगदात्मा हरिरिति
प्रभिन्ते स्म स्तंभं चलितकरवालो दितिसुत: ।
अत: पश्चाद्विष्णो न हि वदितुमीशोऽस्मि सहसा
कृपात्मन् विश्वात्मन् पवनपुरवासिन् मृडय माम् ॥१०॥

अरे क्व-असौ क्व-असौ अरे कहां है यह, कहां है यह
सकल-जगत-आत्मा हरि:- सारे जगत के आत्मा भगवान
इति ऐसे
प्रभिन्ते स्म स्तंभं प्रहार किया जब स्तम्भ पर
चलित-करवाल: चला कर तलवार
दिति-सुत: दिति पुत्र (हिरण्यकशिपु ने)
अत: पश्चात्- उसके पश्चात
विष्णो हे विष्णु!
न हि वदितुम्-ईश:-अस्मि सहसा नहीं बोलने में हे ईश्वर! समर्थ हूं मैं सहसा
कृपात्मन् हे कृपात्मन!
विश्वात्मन् हे विश्वात्मन!
पवनपुरवासिन् हे पवनपुरवासिन!
मृडय माम् मुझे परिपूरित कीजिये

'अरे कहां है, कहां है यह सारे जगत का आत्म स्वरूप" इस प्रकार कहते हुए जब दिति के पुत्र हिरण्यकशिपु ने तलवार चला कर स्तम्भ पर प्रहार किया, तब इसके पश्चात जो हुआ, हे विष्णु! हे ईश्वर! मैं सहसा बोल सकने में समर्थ नहीं हूं। हे कृपात्मन! हे विश्वात्मन! हे पवनपुरवासिन! मुझे परिपूरित कीजिये।

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